*मीडिया पर मुआफी नामा का हुकम*
⭕ आज का सवाल नंबर १३४३⭕
जैसे ही शबे बरात क़रीब आती जाती है, सोसियल मीडिया पर मुआफी नामा कसरत से आने लगता है, और लोग आगे भेजने को भी एक फ़रिज़ाः समझते है, और ये भेज देने से मुत्मइन हो जाते है, के मुआफी हो गई, ऐसा करना कैसा है ? इस बारे में शरई रहनुमाइ फरमाइए
🔵जवाब🔵
حامدا و مصلیا و مسلما
ये बात सहीह हे के शबे बरात में जब आम मगफिरत का एलान होता हे तो कुछ कमनसीब इस रात की रहमत व बरकत व मगफिरत से महरूम रह जाते हैं उन में
*कटारहमी* करने वाला-रिश्ते तोड़ने वाला भी हे. इस लिए लोग इस रात के आने से पहले ही मुआफी मांग लेते हैं.
ये एक बहुत अच्छी बात हे लेकिन…
शबे बरात ही का क्यों इंतज़ार करें ?मौत कभी भी आ सकती हे, अगर किसी मुसलमान का दिल दुखाया हे तो फ़ौरन *मुआफी* मांग लें.
रिश्तेदारों से सिला रहमी-अच्छे सुलूक का हुक्म हे, जैसे *माँ बाप भाई बहन दादा दादी नाना नानी शोहर बीवी और क़रीबी रिश्तेदार* दिल तो इन लोगो का तोड़े, और व्हाट्सप्प पर उन लोगो से मुआफी मांगे जिन को कभी देखा भी नहीं, जिन के साथ कोई रिश्तेदारी नहीं, जिन का कभी दिल तोडा नहीं……!!!! *ये केसी अकलमंदी हे ?*
*पहले माँ बाप भाई बहन दादा दादी नाना नानी शोहर बीवी और क़रीबी रिश्तेदार* रिश्तेदारों से मुआफी मांगे, फिर दुसरो का रुख करें.
अगर वाक़ई किसी का दिल दुखाया हे तो पहले उस की मिन्नतों समजत करें, उस का दिल खुश करें, माली नुकसान पोहचाया हे तो उस की भरपाई करे क़र्ज़ा, वारसा नहीं चुकाया है तो पेहले वह अदा करे फिर *मुआफी नामा* लिखें.
➧इस तरह सिर्फ व्हाट्सप्प वगेरा के रस्मी मेसेज *मुआफी नामा* नहीं बल्कि उस का *मज़ाक* हे.
आज मुसलमानो को आपसी झगड़े ख़त्म कर के इख्तिलाफ को दूर करते हुवे इत्तिहाद का माहौल बनाने की ज़रूरत हे, इस के लिए *सच्ची मुआफी* ज़रूरी हे.
अल्लाह हमें तौफ़ीक़ आता फरमाए. (आमीन)
و الله اعلم بالصواب
✒ अबू महमूद उस्मानी
✍🏻तस्दीक़ व तशीलो इज़ाफ़ा
मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन
🕌उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया.
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